Tuesday, August 25, 2015

उम्मीद

 कभी जो देखोगी मुड़ के, मुझको याद करोगी ना,
कभी यूँही चलते फिरते, मुझको याद करोगी ना.

सावन की ठंडी फुहारों में, जब याद तुम्हारी आती है,
अनभीगे से रह जाते हैं,  बूँदें जब तन छू जाती हैं,
उस वक़्त कभी तुम भी शायद, ठण्डी आँहें भरोगी ना
मुझको याद करोगी ना

पतझड़ का  मौसम जब आये, तपती सी हवाएं चलती हैं,
बिन पानी हम तो तड़पते हैं, होंठों पर पपड़ी पड़ती है,
गर तुम्हें हमारी खबर मिले, अश्रु बरसात करोगी ना
मुझको याद करोगी ना...

Thursday, June 14, 2012

जाने क्या क्या छूट गया

कुदरत का आंचल छूट गया,
वो प्यार का दामन छूट गया,
जाने क्या-क्या छूटा हमसे,
वो प्यारा बचपन छूट गया.

जब याद मुझे वो आता है,
दिल मन ही मन पछताता है,
पतझड़ में खड़ा मैं आज यहाँ,
वो रिमझिम सावन छूट गया.

ना भला था, ना बुरा था,
दिल दिल से सच्चा जुड़ा था,
अब हाय, मतलबी दुनिया में,
निर्दोष वो बंधन छूट गया.

ना चाह थी मुझको पाने की,
ना कुछ खोने का डर ही था,
अब आज की आपाधापी में,
वो कल का जीवन छूट गया.

Monday, October 31, 2011

जन नेता

एक पडोसी का लड़का, मुझसे आकर कहता है,
कौन है ये कुरते वाला जो, बगल में अपने रहता है.
मैंने कहा, ये जीव अजब सा, जन नेता कहलाता है,
जन के कण कण को ये बंदा, रूप बदल कर खाता है.

एक रूप है दीन-हीन सा, घर घर झोली फैलाता है,
दूजे रूप में ये बंदा, विकराल काल बन जाता है.
आये चुनाव तो चुपके से, जन प्रतिनिधि बन जाता है,
अगर कही से जीत गया तो, सर्पदंश दिखलाता है.

दंश लगा दे एक बार तो, मर जाए हम पड़े पड़े,
और हमारी लाशो पर वो, अपनी कमाई खाता है.
बाढ़, सूखा, अकाल पर, रोया नहीं जाता इस से,
हाँ पर, इस विषय पर, घडियाली  आंसू  बहाता है.

जो दिल में दया होगी तेरे, तू कभी नहीं ऐसा  बनना,
आज का चोर और रावण, जन नेता कहलाता है

छाया

मेरे जीवन तट पर ऐसे, दो वृक्षों की छाया है,
एक ने मुझे बनाया है, एक ने मुझे बसाया है.

रिश्ते

बादल की ज़रुरत क्या है, कोई पूछे रेगिस्तान से,
पानी की ज़रुरत क्या है, कोई पूछे किसी किसान से,
शायद ना किसी को होगी, अब इतनी ज़रुरत तेरी,
मुझको है ज़रुरत ऐसी, जैसी होंठों की मुस्कान से.

चाहा है तुम्हें हमने, जैसे लौ को परवाना,
परवाने से भी बढ़के, मैं हूँ तेरा दीवाना.
वो जलता है शमां में, मैं तुझमें ही जीता हूँ,
तुझसे मेरा है रिश्ता जैसे, चेहरे की पहचान से.

Sunday, October 23, 2011

गंगा की कथा

क्यों बिछड़ रही है गंगा हमसे,

कौन हैं वो, जो ऐसा जाल बिछाएँ हैं,
क्या वो, जो सत्ता पे नज़रें जमाएँ हैं,
या वो, जो ऊँची-ऊँची इमारतें बनाएँ हैं,

दूर हो रही हैं, पावन नदियाँ हमसे,
क्यों बिछड़ रही है गंगा हमसे,

मुझे वो दिन बचपन के याद आते हैं,
जब इन्ही तटों पर अपना बसेरा था,
गुज़रती थी शामें, इनकी लहरों में,
इनकी हवाओं में, अपना सवेरा था.

जाने कब छूट गयी, वो दुनिया हमसे,
क्यों बिछड़ रही है गंगा हमसे,

जाने कितने प्राणियों का, ये तारणहार थी,
कितनी नौकाएं थी, जिनका ये पतवार थी,
भेद ना करती थी, रंग रूप गुण दोष में,
तटस्थलियों की जीविका का आधार थी.

रूठ गयी है वो अब तन्हा हमसे,
क्यों बिछड़ रही है गंगा हमसे,

वो छठ का त्यौहार बड़ा याद आता है,
जब गंगा की तटों पर मेला लगता था,
आते थे दूर-दूर से, जनमानस दर्शन को,
हर चेहरा था पराया, पर अपना लगता था.

छूट गया है वो भी जलसा हमसे,
क्यों बिछड़ रही है, गंगा हमसे.

Tuesday, July 19, 2011

वृक्षों को ना काटो

 वृक्षों को ना काटो भैया, वृक्षों को ना काटो,
ये ही जीवन है, सुख-दुःख तुम इनके संग ही बाँटो.

वृक्ष ही देते हैं छाया, और वृक्ष ही दें हरियाली,
वृक्ष तले ही मिलती है, शान्ति और खुशहाली,
अपने जीवन-पथ से तुम इन, मित्रों को ना छाँटो,
वृक्षों को ना काटो.

वृक्ष सबों के प्राण-पखेरू, वृक्ष ही जीवन-धन हैं,
वृक्ष की छाया में अपना, तन-मन-जीवन अर्पण है,
वृक्ष उगाओ, वृक्ष बचाओ, ये संदेसा बाँटो,
वृक्षों को ना काटो.

- - एक छोटा प्रयास उनके लिए, जो मानव-जाति के कल्याण के लिए अवतरित हुए हैं.

कुछ अनछुए पन्ने